Friday, October 19, 2018

मकान सारे कच्चे थे - हरिवंशराय बच्चन | बेस्ट हिन्दी कविता

मकान सारे कच्चे थे - हरिवंशराय बच्चन | Makan Saare Kacche The - Hari Vansh Rai Bachchan | हरिवंशराय बच्चन हिन्दी कविता | Hari Vansh Rai Bachchan Hindi Kavita (Poem) | Hari Vansh Rai Bachchan Best Hindi Kavita (Poems) | हरिवंशराय बच्चन सर्वश्रेष्ठ हिन्दी कविताएं।





मकान चाहे कच्चे थे, लेकिन रिश्ते सारे सच्चे थे...
चारपाई पर बैठते थे, पास-पास रहते थे...
सोफे और डबल बेड आ गए, दूरियां हमारी बड़ा गए....
छत्तों पर अब न सोते है, कहानी किस्से अब न होते है..
आंगन में वृक्ष थे, सांझा सुख दुख थे...
दरवाजा खुला रहता था, रही भी आ बैठता था...
कौवे भी कांवते थे, मेहमान आते जाते थे...
इक साईकल ही पास थी, फिर भी मेल जोल की आस थी....

रिश्ते निभाते थे, रूठते मानते थे...
पैसे चाहे कम थे, माथे पर ना गम थे...
मकान चाहे कच्चे थे, लेकिन रिश्ते सारे सच्चे थे..
अब शायद कुछ पा लिया है,
पर लगता है बहुत कुछ गंवा दिया है..
जीवन की भाग-दौड़ में, क्यों वक़्त के साथ रंगत खो जाती है?
हँसती-खेलती जिंदगी भी आम हो जाती है।
एक सवेरा था जब हँस कर उठते थे हम,
और आज कई बार बिना मुस्कुराये ही शाम हो जाती है।
कितने दूर निकल गए, रिश्तों को निभाते निभाते...
खुद को खो दिया हमने अपनों को पाते पाते...
मकान चाहे कच्चे थे...
रिश्ते सारे सच्चे थे...

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